नई दिल्ली यह दशकों तक रही की अनदेखी का ही परिणाम है कि ग 73वें संविधान (संशोधन) 1992 के माध्यम से पंचायतीराज संस्थाओं में क महिलाओं को पर्याप्त भागीदारी के ने अवसर दिए जाने के बाद भी प्रधान नी पति या सरपंच पति जैसी कुप्रथा महिला नेतृत्व को सशक्त होने से ए रोक रही है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश ती पर पंचायतीराज मंत्रालय द्वारा बनाई से गई सलाहकार समिति ने भी लगभग डेढ़ वर्ष के अध्ययन में यह पाया कि पितृ सत्तात्मक सोच, सीमित कानून और सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाएं पंचायतीराज संस्थाओं में महिलाओं की प्रभावी भागीदारी और नेतृत्व में बाधा बन रही हैं। अब समिति ने । इस प्रथा को समाप्त करने के लिए महिला पंचायत प्रतिनिधि के काम में हस्तक्षेप करने वाले उनके पति या अन्य पुरुष रिश्तेदारों को दंडित किए जाने सहित कई सुझाव शामिल करते हुए अपनी रिपोर्ट सौंप दी है।
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पंचायतीराज मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट के छह जुलाई, 2023 के आदेश के पालन में 19 नवंबर 2023 को भारत सरकार के पूर्व खनन सचिव सुशील कुमार की अध्यक्षता में सलाहकार समिति
• सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर बनी उच्च स्तरीय समिति ने सरकार को सौंपी देशभर की स्थिति पर रिपोर्ट
गठित की थी। समिति ने 14 राज्यों में शोध और क्षेत्रीय दौरे कर निष्कर्षों पर अपनी रिपोर्ट तैयार कर मंत्रालय को सौंप दी है। इसमें बताया गया है कि 73वें संशोधन से पंचायतीराज संस्थाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटों का आरक्षण अनिवार्य किया गया, लेकिन 21 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों ने इसका विस्तार करते हुए आरक्षण की सीमा को 50 प्रतिशत कर दिया है।
इस कारण 2.63 लाख पंचायतों के 32.29 लाख निर्वाचित प्रतिनिधियों में 15.03 लाख यानी लगभग 46.6 प्रतिशत महिलाएं हैं। यह भागीदारी आंकड़ों में भले ही मजबूत दिखाई देती है, लेकिन वास्तविकता इससे अलग है। सच यह है कि सामान्यतः महिला पंचायत प्रतिनिधि स्वतंत्र होकर काम नहीं कर पा रही हैं। उनके कामकाज में उनके पति या अन्य पुरुष रिश्तेदारों का मजबूत हस्तक्षेप है। इसके पीछे के कारणों को भी समिति ने स्पष्ट किया है। जैसे कि महिलाओं में जागरूकता की कमी, अनुभव, ज्ञान, कौशल, नेतृत्व गुणवत्ता की कमी, शिक्षा का निम्न स्तर और संपर्क की कमी आदि। इसके अलावा जाति वर्ग के आधार पर सामाजिक प्रतिरोध, पितृ सत्तात्मक सोच, संबंधित क्षेत्रीय विभागों से सहयोगी की कमी, राजनीतिक दलों का प्रभुत्व और सीटों का रोटेशन जैसे कारक भी इसे प्रभावित कर रहे हैं। इस अव्यवस्था को रोकने के लिए कानूनी प्रविधान की भी कमी महसूस की गई है।
समिति के प्रमुख सुझाव
• प्राक्सी नेतृत्व के बारे में गोपनीय शिकायतों के लिए हेल्पलाइन और महिला निगरानी समिति की प्रणाली बनाई जाए। सत्यापित मामलों में मुखबिर को पुरस्कार दिया जाए।
• प्राक्सी नेतृत्व के सत्यापित मामलों के लिए अनुकरणीय दंड लागू किया जाना चाहिए, जिससे पुरुष रिश्तेदारों के हस्तक्षेप को रोका जा सके।
• महिला लोकपाल की नियुक्ति, ग्राम सभा में महिला प्रधानों का सार्वजनिक शपथ ग्रहण, महिला पंचायत नेताओं का संघ बनाया जाए।
जेंडर रिसोर्स सेंटर स्थापित कर महिला प्रतिनिधियों को नेतृत्व प्रशिक्षण, कानूनी सलाह और सहायता नेटवर्क विकसित हो।
स्थानीय भाषाओं में रीयल टाइम कानूनी और शासन का मार्गदर्शन उपलब्ध कराने के लिए एआइ संचालित उत्तरों को एकीकृत किया जाए।
• महिला पंचायत प्रतिनिधियों का वाट्सएप ग्रुप बनाकर उससे अधिकारियों को जोड़ा जाए।
• पंचायतीराज मंत्रालय का पंचायत निर्णय पोर्टल भी निर्वाचित प्रधानों की भागदारी को ट्रैक कर एक मंच की भूमिका निभाए।
• विधायक और सांसद निर्वाचित महिला प्रधानों के मेंटर बनकर उन्हें प्रोत्साहित करें। जिला और ब्लाक स्तर पर महिला निगरानी परिषद गठित करें।
• निर्वाचित महिला नेताओं के क्षेत्रीय व जिला स्तरीय नेटवर्क, महिला संघ आदि बनाए जाने चाहिए।