प्रयागराज,
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में उन अंशकालिक अनुदेशकों की सेवाओं को समाप्त करने वाले आदेशों को रद्द कर दिया है, जिन्हें छात्र संख्या 100 से कम होने के आधार पर नवीनीकरण से वंचित कर दिया गया था। न्यायमूर्ति मंजूरानी चौहान ने मनोज कुमार और अन्य द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि स्कूलों में छात्रों की संख्या में गिरावट के लिए केवल
उच्च न्यायालय ने दी राहत, नए सिरे से निर्णय लेने का निर्देश
अंशकालिक अनुदेशकों को जिम्मेदार ठहराना न केवल मनमाना है, बल्कि अन्यायपूर्ण भी है। कोर्ट ने कहा कि अनुदेशक का मुख्य कार्य शिक्षण करना है, न कि संस्थागत मामलों का प्रबंधन करना, और छात्र संख्या में कमी के पीछे कई ऐसे कारक हो सकते हैं जो उनके नियंत्रण से बाहर हों। मामले के अनुसार, इन अनुदेशकों की नियुक्ति शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के लक्ष्यों को पूरा
करने के लिए कला, स्वास्थ्य एवं शारीरिक शिक्षा और कार्य शिक्षा जैसे विषयों के लिए वर्ष 2013 के शासनादेश के तहत की गई थी। हालांकि, कई वर्षों तक सेवा देने के बाद अधिकारियों ने इस आधार पर उनका नवीनीकरण रोक दिया कि उनके संबंधित स्कूलों में छात्रों की
संख्या 100 के मानक से नीचे चली गई है। याचिकाओं में दलील दी गई कि वर्ष 2013 के मूल शासनादेश के क्लाज-6 में नवीनीकरण के लिए ऐसी किसी शर्त का उल्लेख नहीं है जो छात्र संख्या घटने पर स्वतः सेवा समाप्ति की बात करती हो। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का संदर्भ दिया, जिसमें कहा गया है कि अंशकालिक अनुदेशकों को नियमित शिक्षकों के समान ही माना जाना चाहिए क्योंकि वे समान योग्यता रखते हैं और उन पर अन्य कोई नौकरी न करने का प्रतिबंध भी होता है, जो उन्हें वास्तव में
पूर्णकालिक शिक्षक के समकक्ष बनाता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि सरकारी संस्थानों में सुविधाओं में सुधार किया जाना चाहिए ताकि वे निजी स्कूलों से प्रतिस्पर्धा कर सके। छात्र संख्या बनी रहे, बजाय इसके कि इसका दोष केवल अनुदेशकों पर मढ़ा जाए। अदालत ने आदेश में पूर्व के विवादित आदेशों को दरकिनार करते हुए सक्षम अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे याचिकाकर्ताओं के मामले पर नए सिरे से विचार करें। अधिकारियों को आदेश दिया है कि वे छह सप्ताह में एक तर्कसंगत और स्पष्ट आदेश पारित करें।