महोदय,
समाचार पत्रों के माध्यम से ज्ञात हुआ है कि दिनांक 1 सितम्बर 2025 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ऐसे शिक्षक जिनकी सेवा 5 वर्ष से अधिक शेप है, के लिए TET अनिवार्य कर दिया गया है। महोदय आप अवगत हैं ही, कि RTE Act 2009 में लाया गया तथा 23 अगस्त 2010 में इसकी गाइड लाइन जारी की गयी। 29 जुलाई 2011 से प्रदेश में RTE Act लागू हुआ है। जिसके द्वारा यह कहा गया था कि 29 जुलाई 2011 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों को इस व्यवस्था अर्थात RTE Act से मुक्त रखा जायेगा।
परन्तु 3 अगस्त 2017 में RTE Act 23(2) में Proviso लाकर समस्त शिक्षकों हेताका अनिवार्य कर दिया गया। लेकिन इसके दायरे में आने वाले प्रभावित पक्ष अर्थात शिक्षकों को किसी प्रकार की नोटिस या सूचना प्रदान नही की गयी।
बाद में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिनांक 01 सितम्बर 2025 को दिये गये अपने निर्णय में कहा गया कि ऐसे शिक्षक जिनकी सेवा 5 वर्ष से अधिक शेष है, उनको सेवा में बने रहने के लिए अधिकतम दो वर्षों में TET करना अनिवार्य होगा।
महोदय सूच्य हो कि उपरोक्त मुकदमे में केवल महाराष्ट्र एवं तमिलनाडु सरकार ही पार्टी थी जबकि उत्तर प्रदेश सहित अन्य प्रदेश पार्टी ही नहीं थे। तत्क्रम में विद्वान न्यायाधीशों की पीठ द्वारा धारा 142 की विशिष्ट शक्तियों का प्रयोग करते हुए देश व्यापी निर्णय दिया गया जिसके कारण देश के लाखों शिक्षकों सहित उत्तर प्रदेश के लगभग 2,50000 शिक्षक परिवारों के सामने आजीविका का संकट उत्पन्न हो गया है। 01 सितम्बर 2025 से दो वर्ष की अवधि तक TET की निर्धारित अहर्ता पूर्ण न होने पर 29 जुलाई 2011 से पूर्व नियुक्त उत्तर प्रदेश के लाखों लाख शिक्षक परिवार भुखमरी की कगार पर होंगे। जबकि इनकी नियुक्ति RTE Act लागू होने से पूर्व होने के कारण इनको TET से मुक्त रखा गया था।
महोदय नैसर्गिक न्याय के अन्तर्गत प्रभावित पक्ष को सुने जाने की व्यवस्था भारत के संविधान द्वारा प्रदत्त की गयी है। अतः आपसे विनम्र निवेदन है कि प्रदेश के लाखों लाख निरपराध शिक्षकों का पक्ष माननीय सर्वोच्च न्यायालय में उचित माध्यम से रखने की कृपा करें ताकि 29 जुलाई 2011 से पूर्व नियुक्त शिक्षकों को न्याय मिल सके तथा उनके परिवारों को अकारण ही मानसिक एवं शारीरिक यंत्रणा से बचाया जा सके।
सादर।
