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चुनाव की ड्यूटी में उलझे शिक्षक, कक्षा में ठहरा बचपन

by Manju Maurya

💁 चुनाव की ड्यूटी में उलझे शिक्षक, कक्षा में ठहरा बचपन

प्रथम दृष्टया यह मामला एक बीएलओ बने शिक्षामित्र और एक प्रधानाध्यापक के बीच टकराव जैसा दिख सकता है, लेकिन दरअसल यह टकराव नहीं, हमारी प्राथमिकताओं की भयावह तस्वीर है। एक तरफ संविधान की सबसे बड़ी प्रक्रिया—चुनाव—और दूसरी तरफ उसी संविधान की आत्मा—शिक्षा। समस्या व्यक्ति की नहीं, व्यवस्था की है, जहाँ हर बार सबसे आसान रास्ता चुना जाता है और उस रास्ते पर खड़े मिलते हैं सरकारी शिक्षक और सरकारी स्कूल। 🙆

निर्वाचन आयोग का पत्र और उस पर आई खबर स्पष्ट करती है कि चुनावी काम में लगे शिक्षकों के वेतन रोकने या धमकाने को आयोग ने गंभीर हस्तक्षेप माना है। यह हस्तक्षेप वाकई गंभीर है, लेकिन उससे भी अधिक गंभीर यह सवाल है कि आखिर शिक्षक को इस स्थिति तक लाया ही क्यों गया? क्या शिक्षा व्यवस्था इतनी हल्की चीज़ है कि उसे बार-बार “अस्थायी रूप से” ठप किया जा सकता है? क्या बच्चों का नियमित शिक्षण हर बार किसी न किसी “राष्ट्रीय प्राथमिकता” के नाम पर पीछे धकेल देना स्वाभाविक मान लिया गया है?

बीएलओ की ड्यूटी कोई एक-दो दिन का काम नहीं होती। महीनों तक शिक्षक कागज़, सूची, सत्यापन और रिपोर्टिंग में उलझा रहता है। स्कूल खुलता है, पर पढ़ाई नहीं चलती। बच्चे आते हैं, पर शिक्षक मजबूर। प्रधानाध्यापक दबाव में है, शिक्षक मजबूरी में है और सबसे ज़्यादा नुकसान उस बच्चे का है, जिसका न तो कोई प्रतिनिधि है और न ही कोई आयोग।

यह कहना आसान है कि चुनाव लोकतंत्र की रीढ़ है, इसलिए सब कुछ जायज़ है। लेकिन सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र की रीढ़ केवल शिक्षक ही हैं? क्या अन्य विभागों में कार्यरत हजारों-लाखों कर्मचारी नहीं हैं? क्या दफ्तरों में बैठने वाले कार्मिक, निगमों, बोर्डों, प्राधिकरणों के कर्मचारी, अर्धसरकारी संस्थानों के लोग इस जिम्मेदारी से मुक्त कर दिए गए हैं? अगर नहीं, तो हर बार वही स्कूल, वही शिक्षक, वही कक्षा क्यों?

निर्वाचन व्यवस्था अगर इतनी विशाल और स्थायी है, तो उसके लिए एक स्थायी, पृथक कैडर क्यों नहीं? क्यों हर बार शिक्षा व्यवस्था से उधार लेकर लोकतंत्र चलाया जाता है? और जब शिक्षा हांफने लगती है, तो उसे “समायोजन” का नाम देकर चुप करा दिया जाता है। यह न शिक्षा के साथ न्याय है, न लोकतंत्र के साथ ईमानदारी।

निर्वाचन आयोग का हस्तक्षेप जरूरी था, क्योंकि वेतन रोकने की धमकी किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं। लेकिन इससे बड़ा हस्तक्षेप उस सोच पर होना चाहिए, जो मानकर चलती है कि शिक्षक हर समय उपलब्ध सरकारी संसाधन है—कभी सर्वे के लिए, कभी जनगणना के लिए, कभी चुनाव के लिए। पढ़ाना उसका मूल कार्य है, लेकिन व्यवस्था की नजर में वह सबसे कम जरूरी लगता है।

अब वक्त है कि शासन और प्रशासन केवल पत्र लिखकर या चेतावनी देकर संतोष न करे, बल्कि मूल प्रश्न पर ठहरकर सोचे। अगर शिक्षा वास्तव में प्राथमिकता है, तो उसे हर बार कुर्बानी की सूची में सबसे ऊपर क्यों रखा जाता है? लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब स्कूल मजबूत होंगे। और स्कूल तभी मजबूत होंगे, जब शिक्षक को हर राष्ट्रीय कार्य का डिफॉल्ट मजदूर मानना बंद किया जाएगा।

✍️ प्रवीण त्रिवेदी 

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