लिव-इन रिलेशन किसी भी कानून में दंडनीय अपराध नहीं
प्रयागराज,
171 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जीवन के मूल अधिकार को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए कहा है कि अंतर्धार्मिक जोड़े की सुरक्षा आवश्यक है। कोर्ट ने लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और शाफिन जहां बनाम अशोकन केएम मामलों में सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए कड़े
शब्दों में कहा कि जाति या धर्म के आधार पर भेदभाव करना संवैधानिक मूल्यों के विरुद्ध है। लिव-इन रिलेशनशिप किसी भी कानून के तहत प्रतिबंधित या दंडनीय अपराध नहीं है। इसके कोर्ट ने टिप्पणी की कि उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम 2021 भी अंतर्धार्मिक संबंधों या विवाह पर तब तक रोक नहीं लगाता, जब तक
उसमें जबरन धर्मांतरण जैसा कोई तत्व शामिल न हो।
कोर्ट ने कहा कि दो वयस्क व्यक्ति अपनी स्वतंत्र इच्छा से साथ रहने का निर्णय लेते हैं, तो उनके निजी जीवन में हस्तक्षेप करने का अधिकार न तो परिवार, न समाज और नही राज्य को है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद के साथी के साथ रहने और
गरिमापूर्ण जीवन जीने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। जिसमें व्यवधान नहीं उत्पन्न किया जा सकता। यह आदेश न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की पीठ ने काजल प्रजापति व अन्य की याचिका पर दिया है। मामले के तथ्यों के अनुसार याची अंतर्धार्मिक लिव-इन रिलेशनशिप में हैं और उन्होंने परिवार वालों से अपनी जान का खतरा बताते हुए सुरक्षा की गुहार लगाई है।