डीएलएड से घटा प्रतियोगियों का मोह किसी डायट में नहीं भरी सभी सीटें प्रदेश के 67 डायट संस्थानों में से 14 में आधी से ज्यादा रिक्त सीटें
प्रयागराज: प्राथमिक शिक्षक भर्ती के लिए अनिवार्य डिप्लोमा इन एलीमेंट्री एजुकेशन (डीएलएड) प्रशिक्षण के प्रति छात्र-छात्राओं का रुझान लगातार कम हो रहा है। यही कारण है कि पिछले कई वर्ष से डीएलएड की सभी सीटें नहीं भर पा रही हैं। सत्र विलंबित होने के कारण वर्ष 2025 के लिए प्रवेश प्रक्रिया 2026 में पूरी हुई और प्रवेश की स्थिति यह है कि प्रदेश के 67 जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थानों (डायट) में से कोई ऐसा नहीं है, जिसकी सभी सीटें भरी हों। 14 डायट ऐसे हैं, जिनमें आधी से ज्यादा सीटों पर अभ्यर्थी नहीं मिले। इस तरह डायट और निजी डीएलएड प्रशिक्षण संस्थानों को मिलाकर 2,39,500 सीटों में से करीब 90 हजार सीटों पर ही प्रवेश हुए हैं।
प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय (K-12)
प्रदेश में 67 जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट) संचालित निजी डीएलएड संस्थानों को मिलाकर डेढ़ लाख सीटों पर नहीं मिले अभ्यर्थी, प्रवेश के मामले में बांदा व श्रावस्ती की स्थिति ठीक हैं। इसमें वाराणसी में संचालित कालेज आफ टीचर एजुकेशन (सीटीई) भी सम्मिलित है। इसके अलावा 3,046 निजी डीएलएड संस्थान एवं 258 अल्पसंख्यक कालेज चल रहे हैं। इस तरह इन सभी संस्थानों को मिलाकर कुल 2,39,500 सीटों में से करीब 1.49 लाख खाली रह गई हैं। स्थिति यह है कि डायट के रूप में संचालित सरकारी प्रशिक्षण संस्थानों की सभी सीटों के लिए भी अभ्यर्थी नहीं मिले। डायट में प्रवेश के मामले में सबसे अच्छी स्थिति बांदा और श्रावस्ती की है। इनमें स्वीकृत कुल 50-50 सीटों में से 49-49 सीटों पर प्रवेश हुए हैं। दोनों में केवल एक-एक सीटें रिक्त हैं। इसके बाद दूसरे नंबर पर फर्रुखाबाद और महराजगंज है, जहां 50-50 सीटों में से केवल दो-दो खाली हैं। तीसरे नंबर पर इटावा, कुशीनगर, बलिया हैं। इटावा में 50 में 47 तथा बलिया एवं कुशीनगर में 100-100 सीटों के सापेक्ष 97-97 पर प्रवेश हुए हैं। इनमें तीन-तीन सीटें खाली हैं। इसके विपरीत मथुरा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, एटा, बदायूं, अमरोहा, बिजनौर, कन्नौज, औरैया, मेरठ, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, ललितपुर, वाराणसी में आधी से ज्यादा सीटें रिक्त हैं। इनमें अधिकांश में 200 सीटें सृजित हैं। इस तरह प्रदेश के डायट संस्थानों में कुल 10,600 सीटें हैं, जिनमें 7,198 सीटों पर प्रवेश हुए हैं, 3,402 सीटें रिक्त रह गई हैं। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि 2018 के बाद से बेसिक शिक्षक भर्ती नहीं आने से डीएलएड पाठ्यक्रम के प्रति आकर्षण कम हुआ है।