हमारा मत “रिव्यू स्वीकार होने के पूरे आसार”
सादर अवगत कराना है कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिनांक 1/09/2025 को शिक्षकों की नियुक्ति एवं पदोन्नति में टेट की अनिवार्यता संबंधी मामले में सुनवाई के अंतर्गत शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू होने के पूर्व से कार्यरत शिक्षकों को टेट उत्तीर्ण करने के आदेश के पूर्व से कार्यरत शिक्षक उक्त आदेश के बाद ऊहापोह की स्थिति में हैं।
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माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश एवं अब तक जाती विभिन्न आदेशों का विश्लेषण निम्नवत है।
1. राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद अधिनियम 1993 में पारित हुआ जिसमें दी गई व्यवस्था के क्रम में राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद जिसे एनसीटीई के नाम से भी जाना जाता है ,का गठन हुआ ।
2. उक्त *एनसीटीई को अध्यापकों के प्रशिक्षण एवं भर्ती संबंधी योग्यता के निर्धारण एवं उसे लागू करने का अधिकार* उस अधिनियम के अंतर्गत दिया गया ।
3. NCTE द्वारा तय योग्यता के क्रम में 3सितंबर 2001 तक तथा 3 सितंबर 2001के बाद निर्धारित अन्य योग्यता के क्रम में तत्समय भर्तियां होती रही।
4. शिक्षा का अधिकार अधिनियम( आरटीई )2009 के अधिनियमित होने के बाद इसकी धारा 23(1) के अंतर्गत *शिक्षकों की योग्यता अथवा अर्हता निर्धारित करने के दायित्व* तय किए गए ।
Rte की धारा 23(1) के अनुसार
*23. (1)* कोई व्यक्ति, जिसके पास केन्द्रीय सरकार द्वारा, अधिसूचना द्वारा, *प्राधिकृत किसी शिक्षा प्राधिकारी द्वारा* यथा अधिकथित न्यूनतम अर्हताएं हैं, शिक्षक के रूप में नियुक्ति के लिए पात्र होगा।*
5. केंद्र सरकार द्वारा इसी धारा 23(1)के क्रम में *एनसीटीई को आदेश संख्या 750a के अंतर्गत निम्न निर्देश के साथ योग्यता निर्धारण का दायित्व* सौंपा गया।
“(आ. 750 (अ). निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 23 की उप-धारा (1) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, केन्द्र सरकार एतदद्वारा राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् को शिक्षक के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए पात्र व्यक्ति के लिए न्यूनतम अर्हताओं का निर्धारण करने वाले *शैक्षिक प्राधिकरण के रूप में प्राधिकृत करती है।)*”
6. इस प्रकार अर्हता निर्धारण की शक्ति प्राप्त करने के उपरांत एनसीटीई द्वारा Ncte अधिनियम की धारा 12 की शक्तियों के क्रम में *23 अगस्त 2010 को एक अधिसूचना* जारी कर यह व्यवस्था दी गई कि 23 अगस्त 2010 के उपरांत होने वाली भर्ती में *प्राथमिक के लिए इंटरमीडिएट एवं बीटीसी अथवा समकक्ष तथा tet* योग्यता अनिवार्य होगी । इसी तरह *कक्षा 6 से 8 के लिए स्नातक तथा बीटीसी एवं टेट* की योग्यता अनिवार्य होगी।
इसके साथ ही एनसीटीई द्वारा पूर्व प्रदत्त शक्तियों (ncte अधिनियम की धारा 12 का इस्तेमाल करते हुए यह भी व्यवस्था दी कि *23 अगस्त 2010 से पूर्व नियुक्त दो श्रेणियों के अध्यापकों ( 2001 के विनियम के अंतर्गत नियुक्त 3सितंबर 2001 के पूर्व के एवं 3 सितंबर2001 के बाद नियुक्त अध्यापक)को उपरोक्त योग्यता पूर्ण करने की आवश्यकता नहीं है।*
23/08/2010 की अधिसूचना के शब्दों में
,”4.इस अधिसूचना की तिथि से पहले नियुक्त अध्यापक-
इस अधिसूचना की तिथि से पूर्व कक्षा 1 से VIII के लिए नियुक्त निम्नलिखित श्रेणी के अध्यापकों को उपर्युक्त पैरा (1) में निर्धारित न्यूनतम योग्यतां हासिल करने की आवश्यकता नहीं है
(क) राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् (स्कूलों में अध्यापकों की भर्ती के लिए न्यूनतम योग्यताओं का निर्धारण) विनियम, 2001 (समय-समय पर यथा संशोधित) के अनुसार 3 सितम्बर, 2001 अथवा उसके बाद नियुक्त अध्यापक।
किन्तु *बी.एड. की योग्यता रखने वाले* कक्षा I से V के अध्यापकों या बी.एड. (विशेष शिक्षा) या डी.एड. (विशेष शिक्षा) की योग्यता रखने वाले अध्यापकों को प्रारंभिक शिक्षा शास्त्र में राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् द्वारा मान्यता प्राप्त *6 माह का विशेष प्रशिक्षण प्राप्त करना होगा ।*
(ख) कक्षा I से V के शिक्षा स्नातक (बी.एड) योग्यताधारी अध्यापक जिसने पूर्व में राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् द्वारा अनुमोदित 6 माह का विशेष आधारभूत अध्यापक पाठ्यक्रम (विशेष बी.टी.सी.) पूरा कर लिया है।
(ग) भर्ती नियमों के अनुसार 3 सितम्बर, 2001 से पहले नियुक्त अध्यापक।
5. कुछ मामलों में इस अधिसूचना की तिथि के बाद नियुक्त अध्यापक इस अधिसूचना की तिथि से पूर्व यदि सरकारों अथवा स्थानीय प्राधिकारियों अथवा विद्यालयों द्वारा विज्ञापन जारी कर अध्यापकों की नियुक्ति की प्रक्रिया आरम्भ कर दी गई है, ऐसी स्थिति में नियुक्तियों, राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् (स्कूलों में अध्यापकों की भर्ती के लिए न्यूनतम योग्यताओं का निर्धारण) विनियम, 2001 (समय-समय पर यथासंशोधित) के अनुसार की जा सकती है।”
इस प्रकार *एनसीटीई के 2010 के बिंदु 4 के क्रम में 2 श्रेणी के शिक्षकों को उक्त योग्यता को धारण करने की आवश्यकता नहीं है* ।
जिसमें प्रथम श्रेणी में *2001 के बाद नियुक्त अध्यापक जो बीटीसी का कोर्स किये हों*
दूसरे *वह जो b.Ed किए हैं लेकिन उन्होंने 6 माह का कोर्स नहीं किया है ,तो उन्हें यह निर्देश दिया गया है कि उन्हें 6 माह का प्रशिक्षण* करना होगा।
इसके अतिरिक्त *वह शिक्षक जिन्होंने b.ed तो किया है लेकिन उन्होंने 6 माह का प्रशिक्षण 2010 से पहले ही कर लिया है*।
दूसरी श्रेणी में *ऐसे शिक्षक जिनकी नियुक्ति 3 सितंबर 2001 के पहले हुई है* ।
इस तरह b.ed किए ऐसे शिक्षक जिन्हें निर्देश दिया गया कि वह 6 महीने का प्रशिक्षण प्राप्त कर ले(*ध्यातव्य इन्हें मात्र प्रशिक्षण करने को कहा गया न कि नवनिर्धारित योग्यता*)।यदि उन्होंने 6 माह का प्रशिक्षण 2015 तक प्राप्त नहीं किया तो 2017 में उक्त समयावधि को बढ़ाकर 2019 किया गया।
7. अब विचारणीय बिंदु यह है कि *जिन शिक्षकों को 23 अगस्त 2010 की धारा 4 के अंतर्गत उसे प्राप्त करने की आवश्यकता से मुक्त किया गया था। उक्त व्यवस्था को आज तक किसी भी संशोधन ,अधिनियम अथवा अधिसूचना के द्वारा रद्द नहीं किया गया है*। Ncte द्वारा निर्धारित यह व्यवस्था *X post facto law*के अंतर्गत भूतलक्षी प्रभाव से बचने के लिए की गई है और आज भी लागू है।इसकी पुष्टि ncte की 2019 की अधिसूचना से भी होती है । जिसके अनुसार
“राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद द्वारा जारी की गई दिनांक 29 जुलाई, 2011 की अधिसूचना संख्या फा. 61-1/2011- राअशिप (एन तथा एस) को नीरज कुमार राय तथा अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य तथा अन्य के मामले में 2017 की सिविल अपील संख्या 9732 के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी और माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने दिनांक 25 जुलाई, 2017 के अपने आदेश के माध्यम से राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद को अंकों की प्रतिशतता के संबंध में निर्दिष्ट करते हुए एक पूरक अधिसूचना जारी करने के निदेश दिए थे। *आवश्यक संशोधन उपर्युक्त को नियमावली की अधिसूचना की तारीख से भूतलक्षी प्रभाव से लागू किया जाना था। यह प्रमाणित किया जाता है कि संशोधित नियमावली को भूतलक्षी प्रभाव से लागू किए जाने से किसी भी प्रत्याशी पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा*।
इसके साथ ही संविधान के अनुच्छेद 20(1) को भी संज्ञान में लिया जाना चाहिए, जो पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू होने वाले कानूनों को रोकता है।
Rte को भूतकाल से लागू किए जाने का कोई प्रावधान अधिनियम में नहीं किया गया है,इसी क्रम में एनसीटीई द्वारा 23 अगस्त 2010 के बिंदु चार में पूर्व से कार्यरत शिक्षकों को उक्त अर्हता से मुक्त रखा था।
8. इसी क्रम में Ncte संशोधन विधेयक 2011 के द्वारा जोड़ी गई ncte अधिनियम की धारा 12a के अनुसार
12क. विद्यालय शिक्षकों की शिक्षा के न्यूनतम स्तर अवधारित करने की परिषद् की शक्ति-..
विद्यालयों में शिक्षा स्तर को बनाए रखने के प्रयोजन के लिए परिषद्, विनियमों द्वारा केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार या किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी द्वारा स्थापित, चलाए जा रहे, सहायता प्राप्त या मान्यताप्राप्त किसी पूर्व प्राथमिक, *प्राथमिक, उच्च प्राथमिक,* माध्यमिक, वरिष्ठ माध्यमिक या इंटरमीडिएट विद्यालय या महाविद्यालय, चाहे जिस नाम से ज्ञात हों, में *अध्यापकों के रूप में भर्ती करने के लिए व्यक्तियों की अर्हताएं अवधारित कर सकेगी :*
*परन्तु इस धारा की कोई बात एकमात्र रूप से ऐसी अर्हताओं को पूरा न करने के आधार पर जो परिषद् द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएं* , राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद् (संशोधन) अधिनियम *2011 के प्रारंभ से ठीक पूर्व* केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार, स्थानीय या अन्य प्राधिकारी द्वारा बनाए गए किसी नियम, विनियम या किए गए आदेश के अधीन किसी पूर्व प्राथमिक, प्राथमिक, उच्च प्राथमिक, माध्यमिक, वरिष्ठ माध्यमिक या इंटरमीडिएट विद्यालय या महाविद्यालय में भर्ती किए गए किसी व्यक्ति के बने रहने पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगी :
परंतु यह और कि पहले परंतुक में निर्दिष्ट किसी शिक्षक की न्यूनतम अर्हताएं इस अधिनियम में या निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (2009 का 35) के अधीन विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर अर्जित की जाएंगी ।
इस प्रकार उपरोक्त *संशोधन अधिनियम 2011 के ठीक पूर्व अर्थात 23/08/2010 से लेकर 25/08/2011 के मध्य नियुक्त अध्यापको को पहले परंतुक में शामिल किया गया है*। पुनः परन्तुक के परन्तुक में निर्धारित योग्यता को निर्धारित समय (2015) में पूरा करने को कहा गया। जिसे rte संशोधन 2017 के आदेश के माध्यम से 2019 तक बढ़ाया गया।
9. उपरोक्त rte संशोधन 2011 के क्रम में एनसीटीई द्वारा *12 नवंबर 2014* को ncte संशोधन 2011 द्वारा प्रतिस्थापित धारा 12a के क्रम में एक नई अधिसूचना जारी की जिसके अनुसार ,
Ncte खंड 12 ए सपठित खंड 32 उपखंड दो धारा घ घ द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए उक्त तिथि(12/11/2014) को एनसीटीई विनियम 2001 का अतिक्रमण किया और *ऐसे अतिक्रमण के पूर्व (अर्थात 2014 के पूर्व) की गई अथवा करने से छूट गई बातों को छोड़कर* एक नियम बनाती है। अर्थात 12 नवंबर 2014 के पूर्व एनसीटीई ने अपने विभिन्न विनियमों में जो भी बात कही थी उन सभी बातों *(23अगस्त 2010 में बिंदु 4 के अंतर्गत कही गई बातें)* पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना नया निर्देश जारी किया ।जिसका प्रावधान 12 नवंबर 2014 की अधिसूचना में है ।12 नवंबर 2014 की अधिसूचना के अनुसार
“फा संख्या 62-1/2012/राअशिप (मानदण्ड तथा मानक) राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद अधिनियम 1993 (1993) का 75वा) के खण्ड १२ए के साथ पठित खण्ड 32 के उप-खण्ड (2) धारा (घघ) के अधीन प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए तथा राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (स्कूलों में अध्यापक की भर्ती के लिए न्यूनतम अर्हताओं का निर्धारण) विनियम 2001 का अतिक्रमण करते हुए, *ऐसे अतिक्रमण से पूर्व की गई* अथवा *करने से छूट गई बातों को छोड़कर* परिषद निम्न् विनियम बनाती है नामतः
(क) पूर्व-प्राथमिक, प्राथमिक, उच्च प्राथमिक, माध्यमिक, उच्च माध्यमिक शिक्षा प्रदान करने वाले किसी भी मान्यताप्राप्त स्कूल में अथवा उच्च माध्यमिक शिक्षा प्रदान करने वाले इंटरमीडिएट कालेज में अध्यापकों की भर्ती के लिए अर्हताएं इन विनियमों के साथ संलग्न पहली और दूसरी अनुसूची (अनुसूचियों) के अनुसार होगी।
अध्यापकों की एक स्तर से दूसरे स्तर पर पदोन्नति के लिए पहली और दूसरी अनुसूची में यथनिर्दिष्ट संगत न्यूनतम अर्हताएं लागू है।
10. उक्त के क्रम में कहा जा सकता है कि 12 नवंबर 2014 की अधिसूचना में किए गए कोई भी प्रावधान 23 अगस्त 2010 में की गई व्यवस्था (बिंदु 4 के अंतर्गत किए गए प्रावधान) पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालती और 23 अगस्त 2010 की व्यवस्था आज भी पूर्ववत लागू है।
इसी क्रम में उक्त याचिका में एनसीटीई द्वारा दिए गए शपथ पत्र के बिंदु संख्या 11 एवं 12 में से एनसीटीई ने भी यह स्वीकार किया है कि 2010 के पूर्व नियुक्त शिक्षकों पर टेट की अर्हता लागू नहीं होती ।लेकिन बिंदु संख्या 13 में एनसीटीई द्वारा इसके ठीक उलट बात की गई है जो भ्रम पैदा करती है।
11. अब चर्चा करते है माननीय सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की।
आदेश की *पृष्ठ संख्या 4* पर उन अपीलकर्ताओं का जिक्र है जो उक्त याचिका में शामिल थे
क. अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान जो इस बात से व्यथित हैं कि उन्हें उन शिक्षकों की भर्ती करने की अनुमति नहीं दी जा रही है जिन्होंने टीईटी उत्तीर्ण नहीं किया है:
ख. संविधान के अनुच्छेद 12 के अर्थ के अंतर्गत प्राधिकारी यह दावा करते हैं कि टीईटी उत्तीर्ण करना न केवल गैर-अल्पसंख्यक बल्कि अल्पसंख्यक संस्थानों में भी शिक्षकों की नियुक्ति के लिए अनिवार्य आवश्यकता है, चाहे वे सहायता प्राप्त हो या गैर-सहायता प्राप्तः और
ग. व्यक्तिगत शिक्षक, जिनकी नियुक्ति निःशुल्क एवं अनिवार्य बाल शिक्षा अधिकार अधिनियम, 2009 के लागू होने से पहले हुई थी, यह दावा कर रहे हैं कि उनकी पदोन्नति के लिए टीईटी योग्यता को अनिवार्य आवश्यकता नहीं बनाया जा सकता।
12. इन याचिकार्ताओं के तथ्यों को सुनने के बाद माननीय न्यायालय द्वारा सुनवाई के *बिंदु संख्या 3* के अंतर्गत निम्न बिंदु निर्धारित किए गए-
क. क्या राज्य इस बात पर जोर दे सकता है कि अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान में नियुक्ति चाहने वाले शिक्षक को टीईटी उत्तीर्ण होना जरूरी है? यदि हां, तो क्या ऐसी योग्यता प्रदान करने से भारत के संविधान द्वारा गारंटीकृत मूल अधिकार पर असर पड़ेगा? अल्पसंख्यक संस्थानों के किसी भी अधिकार पर असर पड़ेगा?
और
ख. क्या आरटीई अधिनियम की धारा 23 की उपधारा (1) के अंतर्गत राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद द्वारा दिनांक 29 जुलाई, 2011 की अधिसूचना संख्या 61-1/2011/एनसीटीई (एन एंड एस) जारी होने से काफी पहले नियुक्त शिक्षकों को, पारा 23 (2) में नए सम्मिलित प्रावधान (द्वितीय प्रावधान) के साथ पठित, तथा वर्षों का शिक्षण अनुभव (मान लीजिए, 25 से 30 वर्ष) होने पर पदोन्नति के लिए पात्र माने जाने हेतु टीईटी उत्तीर्ण करना आवश्यक है?
13. विभिन्न बिंदुओं को सुनने के बाद विभिन्न बिंदुओं के विश्लेषण के क्रम में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा *बिंदु संख्या 168* में कहा गया कि
“एनसीटीई की अधिसूचना में इस आवश्यकता को और पुष्ट करते हुए कहा गया है कि गैर-सहायता
प्राप्त निजी विद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों, या 31 मार्च, 2015 तक कार्यरत शिक्षकों को निर्धारित अवधि के भीतर टीईटी उत्तीर्ण करना होगा। आरटीई अधिनियम और अधिसूचना, दोनों की भाषा में कोई अस्पष्टता की गुंजाइश नहीं है कि आरटीई अधिनियम से पहले नियुक्त शिक्षकों को भी, यदि वे योग्य नहीं हैं, तो दी गई छूट अवधि के भीतर टीईटी की आवश्यकता पूरी करनी होगी। *केवल वे शिक्षक जो 3 सितंबर, 2001 से पहले लागू भर्ती नियमों के अनुसार नियुक्त हुए थे, या जो विशिष्ट अपवादों (जैसे, विशेष बीटीसी या डी.एड. पाठ्यक्रम) के अंतर्गत आते थे, उन्हें छूट दी गई थी।”*
अर्थात बिंदु संख्या 168 के अंतर्गत माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा यह माना गया है की 3 सितंबर 2001 के पूर्व नियुक्त कुछ शिक्षकों को अपवाद स्वरूप छूट दी गई थी।
14.. इसके साथ ही *बिंदु संख्या 169* में न्यायालय द्वारा यह माना गया कि ret की धारा 23 और ncte की अधिसूचनाएं मिलकर *23अगस्त 2010 को या उसके बाद नियुक्त* शिक्षकों के लिए टीईटी को एक अनिवार्य मानदंड बनाती है। इस प्रकार बिंदु संख्या 169 में भी टेट को 23अगस्त 2010 के बाद नियुक्त शिक्षकों के लिए अनिवार्य बताया गया है।
169. इस प्रकार, समग्र रूप से पढ़ने पर, शिक्षा का अधिकार अधिनियम की धारा 23 और एनसीटीई अधिसूचनाएँ मिलकर 23 अगस्त, 2010 को या उसके बाद नियुक्त सभी शिक्षकों के लिए टीईटी को एक अनिवार्य योग्यता मानदंड के रूप में स्थापित करती हैं, और अपेक्षित योग्यता के बिना पहले नियुक्त शिक्षकों के लिए एक समयबद्ध अनुपालन दायित्व के रूप में स्थापित करती है। इसका एकमात्र उद्देश्य प्रारंभिक शिक्षा प्रदान करने वाले सभी संस्थानों में एक समान शिक्षण मानक सुनिश्चित करना है। इस दृष्टि से, टीईटी न केवल एक अनिवार्य पात्रता आवश्यकता है, बल्कि यह अनुच्छेद 21ए के तहत गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अधिकार से प्राप्त एक संवैधानिक आवश्यकता भी है।
15. उपरोक्त के क्रम में कहा जा सकता है कि जब माननीय न्यायालय द्वारा बिंदु संख्या 168 और 169 में यह स्वीकार किया गया है कि 23 अगस्त 2010 की धारा 4 के अंतर्गत शिक्षकों को धारा 23(1) के क्रम में निर्धारित योग्यता से छूट प्राप्त है तथा बिंदु संख्या 169 में यह भी माना गया की टेट की अनिवार्यता 23 अगस्त 2010 के बाद नियुक्त शिक्षकों के लिए ही है ।