प्रयागराज। पारिवारिक पेंशन के लिए पिता के दो नाम साबित करने के लिए मृतक कर्मचारी के परिवार को 46 साल अदालत की दौड़ लगानी पड़ी। कर्मचारी के सेवा अभिलेख में शिखर की स्पेलिंग एस.एच.आई.के.एच.ए.आर और याची के प्रार्थना पत्र में एस.एच.ई.के.एच.ए.आर लिखी है, जिसमें आई और ई अंतर था।
अब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कानपुर नगर निगम के नगर आयुक्त को एक सप्ताह में पारिवारिक पेंशन का भुगतान करने का आदेश दिया है। चेतावनी दी है कि अगर आदेश का व अनुपालन नहीं हुआ तो नगर आयुक्त को 26 फरवरी को व्यक्तिगत रूप से अदालत में
एकवा वा अभिलेख और आश्रितों के प्रार्थना पत्र में दर्ज नाम की स्पेलिंग में अंतर बनी मुसीबत
हाजिर होना पड़ेगा। यह आदेश न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान की एकल पीठ ने निगम कर्मचारी के बेटे रविंद्र नाथ शुक्ला की ओर से दाखिल याचिका पर दिया है। याची के पिता शिखर नाथ शुक्ला कानपुर नगर निगम में कर्मचारी थे। 1980 में उनके निधन के बाद परिवार ने पारिवारिक पेंशन की मांग की। इस पर नगर निगम ने आपत्ति जताई। कहा कि सेवा अभिलेख में अंग्रेजी में दर्ज नाम और आश्रितों की ओर से दिए गए पेंशन के प्रार्थना पत्र में अलग हैं। आश्रितों ने हलफनामा देकर
स्पष्ट किया कि दोनों नाम एक ही व्यक्ति के हैं। याची ही पेंशन का वैध हकदार है। इसके बावजूद विभागीय हठ के कारण परिवार को अदालत की शरण लेनी पड़ी।
17 अक्तूबर 2025 को अदालत ने याचिका मंजूर कर पेंशन देने का आदेश दिया था, फिर भी भुगतान नहीं किया गया। याची ने 2026 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
कोर्ट ने जताई हैरानीः मामले पर हैरानी जताते हुए कोर्ट ने कहा कि जब पहचान साबित करने के लिए हलफनामा और उत्तराधिकार प्रमाणपत्र जैसे ठोस दस्तावेज उपलब्ध थे तो केवल नाम में एक अक्षर के अंतर के आधार पर मृतक आश्रितों की पेंशन 45 वर्षों तक कैसे रोकी जा सकती है।