प्रयागराजः इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्प्णी में कहा है कि प्रथमदृष्टया किसी विवाहित पुरुष का केसी वयत्क महिला के साथ उसकी सहनति से लिव-इन रिलेशनशिप में रहन अपराध नहीं है। इस पर उसे किसी अपराध के लिए अभियोजित नहीं किया जा सकता। नैतिकता, सामजिक अवधारणा और कानून को अलग-अलग रखना होगा।
न्यायमूर्ति जेजे मुनीर तथा न्यायमूर्ति तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने यह टिप्पणी शाहजहांपुर निवासी अनामिका तथा नेत्रपाल की
कहा-नैतिकता, सामाजिक अवधारणा कोर्ट को गाइड नहीं कर सकते, इन्हें कानून से अलग रखा जाए
याचिका की सुनवाई के दौरान की है। कोर्ट ने जोड़े की गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए अनामिका के परिवार वालों से कहा है कि वे याचीगण को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाएं, न ही उनके घर में हुसें। 8 वर्षीय याची अनामेका की मां ने एफआइआर दर्ज कराई है कि विवाहित नेत्रयाल उसकी बेटी को बहला-फुसलाकर अपने साथ ले गया है। चूंकि वह विवाहित पुरुष है इसलिए अन्य महिला के साथ रहने में अपराध का आरोपित हो सकत है।
कोर्ट ने दोनों याचीगण के संयुक्त शप्थ पत्र को रिकार्ड पर लेने के बाद पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया कि वे याचीगण की सुरक्षा सुनिश्चित करें। इस संदर्भ में शक्तिवाहिनी बनाम यूनियन आफ इंडिया (2018) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया, जिसमें पुलिस अधीक्षक को दो वयस्कों की सुरक्षा के लिए विशेष दायित्व सौंप गया है। राज्य सरकार व शिकायतकर्ता को जवाबी शपथ पत्र दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय देते हुए कोर्ट ने
अगली सुनवाई तिथि आठ अप्रैल नियत की है। साथ ही अनमिका के परिवार वालों को अदेश दिया है क्रि वे याचीगण के घर में प्रवेश करने या उनसे सीधे या किसी भी રૂભેવટ્ર નિઋ માધ્યમ સે સંપર્વ નહીં करें। कोर्ट ने कहा है कि पुलिस अधीक्षक सुरक्षा के लिए व्यक्तिग्त रूप से जिम्मेदार होंगे।
याची ने एसपी को अपने परिवार से जीत्वन को खतरे की शिकायत की थी। कहा था कि वह बालिग है और अपनी मर्जी से लिव इन में रह रही है, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
यदि कानून के तहत कोई अपराध नहीं बनता है तो सामाजिक रय और नैतिकत, नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय की कार्रवाई का मार्गदर्शन नहीं करेगी।
– इलाहाबाद हाई कोर्ट