नई दिल्ली: टीईटी की अनिवार्यता के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ शिक्षकों ने कानूनी लड़ाई का मन बनाया है। सरकार के छोर पर राहत का दबाव बनाने के साथ ही शिक्षकों ने आदेश पर पुनर्विचार करने की गुहार लगाई है। शिक्षक संघ के अलावा उत्तर प्रदेश सरकार और तमिलनाडु सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की हैं। तमिलनाडु सरकार का कहना है कि टीईटी की अनिवार्यता उन्हीं शिक्षकों पर लागू होती है जिनकी नियुक्ति आरटीई कानून लागू होने के बाद हुई। यह अनिवार्यता उन शिक्षकों पर लागू नहीं होती जिनकी नियुक्ति इस कानून के लागू होने के पहले के नियम कानूनों के तहत हुई।

सुप्रीम कोर्ट ने गत एक सितंबर को दिए आदेश में कक्षा एक से आठ को पढ़ाने वाले सभी शिक्षकों (जिनकी नौकरी पांच वर्ष से ज्यादा बची है) के लिए दो वर्ष के भीतर टीईटी पास करना अनिवार्य किया है। पांच वर्ष से कम बची नौकरी वालों को अगर प्रोन्नति पानी है तो उनके लिए टीईटी अनिवार्य है। इस आदेश का सबसे ज्यादा
अखिल भारतीय प्राथमिक शिक्षक संघ ने दाखिल की पुनर्विचार याचिका, उम्र और तमिलनाडु की भी दस्तक
असर आरटीई कानून लागू होने से पहले हुई नियुक्तियों पर है। अखिल भारतीय प्राथमिक शिक्षक संघ ने सुप्रीम कोर्ट से टीईटी की अनिवार्यता के आदेश पर पुनर्विचार का अनुरोध करते हुए कहा कि इस फैसले का देश भर में करीब 10 लाख उन शिक्षकों पर प्रभाव पड़ रहा है। इन शिक्षकों की नियुक्ति शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून लागू होने से पहले लागू नियम कानूनों के मुताबिक हुई है। उन शिक्षकों के लिए नियुक्ति के समय टीईटी (शिक्षक पात्रता परीक्षा) की अनिवार्यता नहीं थी और अब उनमें से ज्यादातर 50 वर्ष से ज्यादा आयु के हैं। संघ का कहना है कि टीईटी की अनिवार्यता को पूर्व प्रभाव से लागू करने से बड़ी संख्या में शिक्षक बर्खास्त
होंगे, उन्हें प्रोन्नति नहीं मिलेगी उनका जीवनयापन का अधिकार प्रभावित होगा।
शिक्षक संघ ने वकील आरके सिंह के जरिये दाखिल पुनर्विचार याचिका में कहा कि एनसीटीई ने 3 अगस्त, 2010 को अधिसूचना जारी कर न्यूनतम योग्यता में टीईटी को जोड़ दिया। लेकिन अधिसूचना का पैरा चार नई तय न्यूनतम योग्यता से उन शिक्षको को छूट देता है जो अधिसूचना जारी होने की तारीख से पहले नियुक्त हो चुके हैं। इसलिए जो शिक्षक 23 अगस्त, 2010 से पहले नियुक्त हुए, उन्हें टीईटी से छूट है। कोर्ट ने अधिसूचना को ऐसे पढ़ा है जैसे कि कोई छूट थी ही नहीं, ऐसे में फैसले में स्पष्ट रूप से खामी है जिस पर पुनर्विचार की जरूरत है। यह भी कहा कि बाद में आए विधायी व कार्यकारी आदेशों में भी एनसीटीई की दी छूट जारी रहेगी। एनसीटीई ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में स्पष्ट किया कि जिन शिक्षकों की नियुक्ति 23 अगस्त, 2010 के पहले हुई है उन्हें नौकरी में बने रहने या प्रोन्नति के लिए टीईटी करने की जरूरत नहीं। ये भी कहा गया कि उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में शिक्षकों की भर्तियां प्रतियोगी परीक्षा से होती है