लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में बेसिक शिक्षा विभाग के शिक्षक को बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ पारित पदावनति (रिवर्जन) के आदेश को निरस्त कर दिया है। न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि संबंधित शिक्षक को सेवा निवृत्ति तक जूनियर बेसिक स्कूल के सहायक अध्यापक के पद पर मानते हुए वेतन एवं समस्त बकाया भुगतान किया जाए।
मामला वर्ष 2009 का है, जब एक शिक्षक को पत्रकारिता में संलिप्त होने के आरोप में निलंबित कर बाद में जूनियर बेसिक स्कूल से प्राइमरी स्कूल में पदावनत कर दिया गया था। इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए शिक्षक ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

सुनवाई के दौरान यह महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया कि—
शिक्षक को विधिवत चार्जशीट नहीं दी गई,
न ही किसी प्रकार की मौखिक सुनवाई या गवाहों की जिरह कराई गई,
शिकायतकर्ता द्वारा स्वयं शिकायत को फर्जी बताया गया,
और बिना समुचित जांच के ही विभाग ने कठोर कार्रवाई कर दी।
न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि बिना उचित सुनवाई और साक्ष्य के की गई विभागीय कार्यवाही प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है, इसलिए यह कानूनी रूप से टिक नहीं सकती।
इसके साथ ही अदालत ने यह भी माना कि U.P. Government Servant Conduct Rules, 1956 बेसिक शिक्षा विभाग के शिक्षकों पर लागू नहीं होते, इसलिए केवल पत्रकारिता में संलिप्तता के आधार पर कार्रवाई करना भी अनुचित है।
हालांकि, शिक्षक 31 मार्च 2020 को सेवानिवृत्त हो चुके हैं, इसलिए उन्हें पुनः पदस्थापित करना संभव नहीं है। लेकिन अदालत ने आदेश दिया कि उन्हें 28 मार्च 2009 से सेवानिवृत्ति तक जूनियर बेसिक स्कूल के सहायक अध्यापक के रूप में मानते हुए वेतन, एरियर एवं अन्य समस्त लाभ दिए जाएं।
यह फैसला शिक्षा विभाग के हजारों शिक्षकों के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर के रूप में देखा जा रहा है, खासकर उन मामलों में जहां बिना समुचित जांच के विभागीय कार्रवाई की जाती है।